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October 16, 2026

लैलूंगा वन क्षेत्र में हाथियों का आतंक – एक ही रात में तीन मौतें, मुआवजे का इंतज़ार!

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लैलूंगा वन क्षेत्र में हाथियों का आतंक – एक ही रात में तीन मौतें, मुआवजे का इंतज़ार!

लैलूंगा/22 जुलाई 2025 की रात लैलूंगा वन परिक्षेत्र के अंतर्गत मोहनपुर और गोसाईडीह गांव में हाथियों का कहर टूट पड़ा। हथिनी और उसके शावक ने दो गांवों में जमकर उत्पात मचाया, जिससे तीन निर्दोष लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। वन विभाग ने मुआवजा देने का वादा तो किया, लेकिन अब तक पीड़ित परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।


🩸 गोसाईडीह में मासूम की मौत

गोसाईडीह गांव के सत्यम राउत (3 वर्ष) अपने घर में गहरी नींद में था। अचानक हथिनी और उसका शावक घर में घुस आए। मासूम को सूंड से उठाकर पटक दिया गया। पलभर में ही मासूम की सांसें थम गईं। गांव में चीख-पुकार मच गई, लेकिन मदद पहुंचने से पहले ही घर खंडहर में बदल चुका था।



🩸 मोहनपुर में महिला पर हमला

इधर मोहनपुर गांव में संतरा बाई राठिया अपने घर पर थीं। हथिनी को घर की ओर आते देख वो घबराकर भागीं। तभी हथिनी ने सूंड से पकड़कर उन्हें जमीन पर पटक दिया और पैरों तले कुचल दिया। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। इस घटना को देखकर पूरा गांव दहशत में आ गया।


🩸 सोते-सोते मौत की नींद में पुरुषोत्तम प्रधान

इसी रात पुरुषोत्तम प्रधान अपने घर में चैन की नींद सो रहे थे। अचानक हथिनी ने उनके मकान की दीवार ढहा दी। मलबे में दबकर उनकी मौके पर मौत हो गई। परिवार वालों की चीखें और ग्रामीणों का रोष आसमान छू गया, लेकिन हाथियों के सामने सब लाचार हो गए।

⚡ वन विभाग के वादे – अब तक अधूरे

घटना के बाद वन विभाग ने मुआवजे की घोषणा तो कर दी थी, लेकिन हकीकत में पीड़ित परिवारों को आज तक एक रुपया भी नहीं मिला। परिवारजन आज भी दर-दर भटक रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और वन विभाग केवल कागजों पर संवेदना जता रहे हैं, जमीनी हकीकत शून्य है।


🔥 ग्रामीणों का आक्रोश – आंदोलन की चेतावनी

लगातार बढ़ती हाथियों की गतिविधि से ग्रामीणों में भारी गुस्सा है। गांव वालों का कहना है कि अगर जल्द ही मुआवजा और स्थायी समाधान नहीं मिला, तो वे सड़क पर उतरकर जोरदार आंदोलन करेंगे। लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वन विभाग हाथियों को रोकने में क्यों नाकाम साबित हो रहा है।

👉 लैलूंगा अंचल में यह पहली घटना नहीं है। लगातार हाथियों का आतंक यहां की आमजनजीवन को निगल रहा है। लेकिन दुखद यह है कि मौतें दर्ज हो जाने के बाद भी पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा। अब सवाल है – आखिर कब तक लैलूंगा के ग्रामीण हाथियों के आतंक और प्रशासन की लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे?

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