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October 15, 2026

लैलूंगा ()। गरीबों के सिर पर पक्की छत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) यदि कागजों में ही पूर्ण हो जाए, तो यह महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि योजना की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला है।

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लैलूंगा ()। गरीबों के सिर पर पक्की छत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) यदि कागजों में ही पूर्ण हो जाए, तो यह महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि योजना की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला है।
इसी क्रम में रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पोतरा में प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर सामने आए कथित अनियमितताओं के आरोपों ने इसी तरह के सवालों को जन्म दिया है। मामला उस समय और भी गंभीर हो गया, जब सोशल ऑडिट की प्रक्रिया के बीच प्रस्तावित ग्राम सभा स्थगित कर दी गई। अब ग्रामीणों के मन में सवाल है कि आखिर जिन अभिलेखों और निर्माण कार्यों की समीक्षा सार्वजनिक रूप से होनी थी, उन पर चर्चा का अवसर क्यों टल गया?

सोशल ऑडिट के बीच ग्राम सभा स्थगित, आखिर वजह क्या?
जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत पोतरा में प्रधानमंत्री आवास योजना से संबंधित सोशल ऑडिट की प्रक्रिया 6 अक्टूबर 2026 से शुरू होने की जानकारी दी गई थी। हालांकि, सोशल ऑडिट टीम के 7 अक्टूबर को पंचायत पहुंचने की बात सामने आई है। शनिवार को ग्राम सभा के माध्यम से ऑडिट से संबंधित जानकारी ग्रामीणों के समक्ष रखी जानी थी, लेकिन बैठक स्थगित कर दी गई।

इस संबंध में रोजगार सहायक ने फोन पर बताया कि कोरम पूरा नहीं होने के कारण ग्राम सभा की बैठक स्थगित की जा रही है। उनका यह स्पष्टीकरण सामने आने के बाद बैठक स्थगित होने का एक कारण स्पष्ट हुआ है, लेकिन ग्रामीणों के अन्य सवाल अभी भी जवाब की प्रतीक्षा में हैं। यदि कोरम पूरा नहीं हुआ, तो अगली ग्राम सभा कब आयोजित होगी? क्या सोशल ऑडिट में सामने आए बिंदुओं को अगली बैठक में सार्वजनिक किया जाएगा? क्या ग्रामीणों को संबंधित अभिलेखों और भुगतान की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी? इन सवालों पर संबंधित अधिकारियों की स्पष्ट जानकारी सामने आना आवश्यक है।

बिना मकान बनाए पूर्णता का दावा? जियो-टैगिंग और मजदूरी भुगतान पर सवाल..?
बता दें, ग्रामीणों से मिली जानकारी और सामने आए आरोपों के अनुसार, प्रधानमंत्री आवास योजना के कुछ मामलों में वास्तविक निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही जियो-टैगिंग किए जाने तथा योजना की राशि आहरित किए जाने की शिकायतें हैं। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ आवासों में नींव तक की खुदाई नहीं होने के बावजूद निर्माण की स्थिति को आगे बढ़ा हुआ अथवा आवास को पूर्ण दर्शाया गया। कुछ मामलों में मजदूरी भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, बाद में संबंधित खातों में राशि जमा कराए जाने का दावा भी किया जा रहा है।हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और अभिलेखीय सत्यापन होना अभी आवश्यक है। लेकिन वहीं दूसरी बड़ा सवाल एक ही आवास को दो हितग्राहियों के नाम किया गया है? संबंधित भुगतान अभिलेखों, बैंक विवरणों, जियो-टैगिंग की तस्वीरों तथा मौके पर मौजूद निर्माण की स्थिति का मिलान किए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। और दुसरा सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी आवास में वास्तव में निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हुआ था, तो उसकी जियो-टैगिंग किस आधार पर की गई? यदि आवास को पूर्ण दर्शाया गया, तो भौतिक सत्यापन किसने किया? और यदि मजदूरी भुगतान दर्ज है, तो उसके पीछे वास्तविक कार्य और श्रमिकों की उपस्थिति का प्रमाण क्या है? इन सवालों का जवाब केवल कागजी रिपोर्ट से नहीं, बल्कि मौके पर जांच और मूल अभिलेखों के सत्यापन से ही सामने आ सकता है।

सोशल ऑडिट का उद्देश्य ही सार्वजनिक जवाबदेही..
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में सोशल ऑडिट का उद्देश्य योजना के क्रियान्वयन, पात्रता, निर्माण की वास्तविक स्थिति, भुगतान और अभिलेखों की पारदर्शिता की समीक्षा करना है। इसके माध्यम से यह पता लगाया जा सकता है कि स्वीकृत आवासों का निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप हुआ या नहीं और लाभार्थियों को योजना का वास्तविक लाभ मिला या नहीं। ऐसे में सोशल ऑडिट के दौरान मस्टर रोल, भुगतान वाउचर, कैश बुक, माप पुस्तिका जहां लागू हो, जियो-टैगिंग रिकॉर्ड, आवास की पूर्णता संबंधी विवरण और बैंक भुगतान के अभिलेखों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी अनियमितता की शिकायत सामने आती है, तो संबंधित पक्षों से जवाब लेकर निष्कर्षों को अभिलेखों के आधार पर दर्ज किया जाना चाहिए। वहीं ग्राम सभा का स्थगित होना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि सोशल ऑडिट के निष्कर्ष ग्रामीणों के सामने रखे जाने थे, तो बैठक की अगली तारीख और आगे की प्रक्रिया को सार्वजनिक करना पारदर्शिता की दृष्टि से आवश्यक है।
अब जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे..
पोतरा पंचायत में उठे सवालों का समाधान तभी संभव है, जब जांच प्रक्रिया पारदर्शी और तथ्यपरक हो। संबंधित अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे आरोपों से जुड़े प्रत्येक आवास का भौतिक सत्यापन कराएं और जियो-टैगिंग में दर्ज तस्वीरों की वास्तविक निर्माण स्थिति से तुलना करें। साथ ही, स्वीकृति, किस्तों के भुगतान, मजदूरी संबंधी प्रविष्टियों, बैंक खातों में राशि जमा होने के दावों तथा आवास की पूर्णता के रिकॉर्ड का मिलान किया जाए।यदि किसी स्तर पर गलत प्रविष्टि, अनियमित भुगतान अथवा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, जिन लोगों पर आरोप हैं, उन्हें भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए, ताकि जांच किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष के बजाय प्रमाणों पर आधारित रहे।

अब निगाहें अगली ग्राम सभा और सोशल ऑडिट की रिपोर्ट पर टिकी हैं। ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि उनके गांव में गरीबों के आवासों की वास्तविक स्थिति क्या है, योजना की राशि का उपयोग किस प्रकार हुआ और शिकायतों में कितनी सच्चाई है। और वहीं पोतरा पंचायत में ग्राम सभा स्थगित होने के पीछे कोरम की कमी बताई गई है, लेकिन आवास निर्माण, जियो-टैगिंग और मजदूरी भुगतान से जुड़े आरोपों का जवाब अभी अभिलेखीय जांच से ही मिलेगा। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इन सवालों की निष्पक्ष जांच कर ग्रामीणों के सामने तथ्य रखता है या मामला केवल कागजी कार्यवाही तक सीमित रह जाता है। वहीं सवाल स्पष्ट है,गरीबों के घर वास्तव में बने हैं या कहीं आवास योजना की प्रगति कागजों पर ही दर्ज कर दी गई? इसका जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और प्रमाणित अभिलेखों से सामने आना चाहिए।

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