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October 16, 2026

*पुरुषोत्तम मास का महत्व : भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि का पावन अवसर*

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*पुरुषोत्तम मास का महत्व : भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि का पावन अवसर*
अवधि : 17 मई से 15 जून 2026 तक
हिंदू धर्म में प्रत्येक पर्व और मास का अपना विशेष महत्व है, लेकिन हर तीन वर्ष में आने वाला अधिकमास, जिसे मल मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस पूरे माह में श्रद्धालु पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, जप, तप, ध्यान, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। मान्यता है कि इस माह में किए गए पुण्य कार्यों का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है।


हर तीन वर्ष में क्यों आता है अधिकमास?
भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना में अंतर होता है। सूर्य वर्ष लगभग 365 दिन 6 घंटे का माना जाता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इस प्रकार दोनों में करीब 11 दिनों का अंतर रह जाता है। यही अंतर हर तीन वर्षों में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
मल मास क्यों कहा जाता है?
हिंदू परंपराओं में अधिकमास के दौरान विवाह, गृहप्रवेश, नामकरण, यज्ञोपवीत और नई वस्तुओं की खरीद जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं। अतिरिक्त और असामान्य होने के कारण इसे “मलिन मास” कहा गया, जिससे इसका नाम “मल मास” पड़ा। हालांकि धार्मिक दृष्टि से यह मास अत्यंत पुण्यकारी और भगवान की भक्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है।


पुरुषोत्तम मास नाम कैसे पड़ा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब अधिकमास का प्राकट्य हुआ, तब किसी भी देवता ने इसका अधिपति बनने की इच्छा नहीं जताई। तब ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे इस मास को स्वीकार करें। भगवान विष्णु ने इसे अपना लिया। चूंकि भगवान विष्णु का एक नाम “पुरुषोत्तम” भी है, इसलिए अधिकमास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।
हिरण्यकश्यप वध से जुड़ी कथा
पुराणों में अधिकमास का संबंध दैत्यराज हिरण्यकश्यप की कथा से भी बताया गया है। ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करने के बाद हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर समझने लगा था। तब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर अधिकमास में संध्या समय देहरी पर अपने नाखूनों से उसका वध किया और धर्म की रक्षा की।
पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक महत्व


यह मास आत्मशुद्धि, साधना और ईश्वर भक्ति का विशेष काल माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान किए गए जप, तप, योग, ध्यान और भक्ति से मनुष्य अपने भीतर के विकारों को दूर कर आत्मिक शांति प्राप्त करता है। यह समय स्वयं को तन, मन और आत्मा से पवित्र करने का अवसर होता है।


पुराणों के अनुसार पुरुषोत्तम मास में—
व्रत-उपवास
भगवान विष्णु की पूजा
विष्णु मंत्रों का जाप
श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण एवं देवी भागवत का पाठ
दान-पुण्य
भजन-कीर्तन एवं ध्यान
विशेष फलदायी माना गया है। श्रद्धालु पूरे माह भगवान विष्णु की आराधना कर सुख, शांति और मोक्ष की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुरुषोत्तम मास में सच्चे मन से की गई भक्ति व्यक्ति के पापों का शमन कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
आचार्य पंडित परमानंद शास्त्री
जुनाडीह लैलूंगा जिला रायगढ़ छoग़o

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