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June 18, 2026

*ताड़ पत्र पांडुलिपियों को पढ़ने की अद्भुत विधि, सेमी पत्ते के रस से उभरते है प्राचीन अक्षर*

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*ताड़ पत्र पांडुलिपियों को पढ़ने की अद्भुत विधि, सेमी पत्ते के रस से उभरते है प्राचीन अक्षर*

*ताड़ पत्रों में छुपा है नाड़ी वैद्य का अद्भुत ज्ञान भंडार*

*रायगढ़ में संरक्षित हैं आयुर्वेद, नाड़ी विज्ञान और प्राचीन चिकित्सा पद्धति की दुर्लभ पांडुलिपियां*

*भारत सरकार के पांडुलिपि संरक्षण अभियान के तहत रायगढ़ जिला प्रशासन कर रहा महत्वपूर्ण कार्य*

रायगढ़, 27 मई 2026/ भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की अमूल्य धरोहर आज भी ताड़ पत्रों में सुरक्षित है। सदियों पुराने इन दुर्लभ ज्ञान स्रोतों के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए भारत सरकार की ज्ञानभारतम्’ राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के तहत छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला प्रशासन द्वारा विशेष पहल की जा रही है। जिले में विभिन्न स्थानों पर संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण कर उन्हें संरक्षित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसी क्रम में प्रशासन की टीम रायगढ़ के कोतरा रोड स्थित उस स्थान तक पहुंची, जहां प्रख्यात नाड़ी वेदाचार्य स्वर्गीय पंडित विश्वनाथ मिश्रा से जुड़ी दुर्लभ ताड़ पत्र पांडुलिपियां आज भी सुरक्षित रखी गई हैं।
पंडित स्वर्गीय पंडित विश्वनाथ मिश्रा इन्हीं पांडुलिपियों के आधार पर लोगों का उपचार किया करते थे। वे अपने समय के प्रख्यात नाड़ी वैद्याचार्य थे तथा रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधर सिंह के नवरत्नों में शामिल थे। वे राजकीय वैद्य के रूप में भी अपनी सेवाएं देते थे।

प्रख्यात नाड़ी वेदाचार्य पंडित विश्वनाथ मिश्रा के सुपुत्र श्री पीतांबर मिश्रा ने प्रशासन की टीम को बताया कि ये पांडुलिपियां पूर्णतः आयुर्वेद और नाड़ी विज्ञान से संबंधित हैं तथा उड़िया भाषा में लिखी गई हैं। उन्होंने बताया कि सामान्य आंखों से इन ताड़ पत्रों पर लिखे अक्षर स्पष्ट दिखाई नहीं देते। इन्हें पढ़ने की एक विशेष पारंपरिक पद्धति है। ताड़ पत्रों पर सेमी के पत्ते का रस लगाने के बाद अक्षर स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं। लगभग दो सौ ताड़ पत्र में यह विधि तैयार की गई है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों द्वारा तैयार की गई  इस ज्ञान के स्रोत हमारी विरासत की अनमोल धरोहर एवं संपत्ति है।  हमारी नवीन पीढ़ियां भी इसकी महत्व की समझ रहे है और इस प्राचीन धरोहर को संभाल कर रख रहे है।
पंडित पीतांबर मिश्रा ने बताया कि पांडुलिपियों को उनके परिवारजनों श्री सत्येंद्र मिश्रा एवं श्री राजेंद्र कुमार मिश्रा द्वारा वर्षों से संरक्षित किया जा रहा है। हमारा मानना है कि  ताड़ पत्रों में संरक्षित यह ज्ञान भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। इन पांडुलिपियों का संरक्षण न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

उल्लेखनीय है भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे ज्ञानभारतम्’ राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान का उद्देश्य देशभर में बिखरी प्राचीन पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, डिजिटलीकरण और अध्ययन को बढ़ावा देना है। रायगढ़ जिला प्रशासन द्वारा इस अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि जिले में मौजूद दुर्लभ धरोहरों को सुरक्षित रखा जा सके और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके।

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